मथुरा शैली और अमरावती शैली की विशेषताएं

 मथुरा शैली का विकास पहली ईस्वी से लेकर तीसरी ईस्वी के बीच की अवधि में यमुना नदी के किनारे मथुरा मैं मथुरा शैली की मूर्तियों का विकास हुआ
 मथुरा शैली में सभी तीनों धर्म यानी बौद्ध धर्म हिंदू धर्म और जैन धर्म की मूर्तियों और कहानियों के आधार पर चित्र का समावेश करके मूर्तियों और चित्रों में पिरोया जाता था
 यह मूर्तियां मौर्य काल के दौरान मिली पहले की एक्स मूर्तियों के नमूने के आधार पर आधारित है 
मथुरा शैली ने मूर्तियों के प्रतीकों का प्रभावशाली उपयोग दिखाया है 
मथुरा शैली में हिंदुओं की मूर्ति के उदाहरण इस प्रकार है जैसे शिवलिंग
 इसी प्रकार बौद्ध धर्म में बौद्ध की मूर्तियों के चारों और प्रभाव मंडल गांधार शैली की तुलना में बड़ा है और जयंती पैटर्न से अलंकृत है 
बुद्ध को दो बोधिसत्व से घिरा हुआ दिखाया गया है


अमरावती शैली की विशेषत निम्नलिखित दिया गया है

भारत के दक्षिणी भाग में अमरावती शैली का विकास सातवाहन शासकों की देखरेख में कृष्णा नदी के किनारे विकसित हुआ
 जहां अन्य दो सैलियों ने एक एकल आश्रित पर बल दिया वहीं अमरावती शैली में गतिशील आकृतियों के प्रयोग पर अधिक बल दिया गया है
 इस शैली की मूर्तियों में त्रिवंग आश्रम यानी तीन झुकाओं के साथ शरीर का अत्यधिक प्रयोग किया गया है

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